UP विधानसभा चुनाव: आखिर कांग्रेस ने क्यों पकड़ रखी है150 सीटों की जिद? सपा के सामने सीट शेयरिंग की चुनौती

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस के बीच सीटों का बंटवारा अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन बातचीत शुरू होने से पहले ही दोनों दलों के बीच संख्या को लेकर खींचतान दिखाई देने लगी है। कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने साफ कहा है कि पार्टी गठबंधन में 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी और सीट शेयरिंग पर बातचीत अक्टूबर में पूरी होने की उम्मीद है। कांग्रेस का कहना है कि वह सभी 403 सीटों पर तैयारी कर रही है और गठबंधन में सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहती है।

लेकिन कांग्रेस की 150 सीटों की मांग को समझने के लिए केवल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है। कांग्रेस के आत्मविश्वास के पीछे सबसे बड़ा आधार 2024 का लोकसभा चुनाव है। 2024 में सपा और कांग्रेस ने यूपी में मिलकर चुनाव लड़ा। सपा ने 62 और कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजे में सपा ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं। यानी गठबंधन ने 80 में से 43 लोकसभा सीटें अपने नाम कीं। यहीं से 2027 की सीट शेयरिंग का असली गणित शुरू होता है।

कांग्रेस की नजर सिर्फ अपनी जीती 6 लोकसभा सीटों पर नहीं

कांग्रेस के लिए 2024 का परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने कम सीटों पर लड़कर भी अपनी स्थिति में सुधार दिखाया। 2017 में सपा के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने 105 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था और केवल 7 सीटें जीत सकी थी। 2022 में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे और कांग्रेस सिर्फ 2 विधानसभा सीटों तक सीमित रही।

लेकिन 2024 में कांग्रेस ने 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटें जीतीं। इस प्रदर्शन ने पार्टी को यह राजनीतिक आधार दिया कि वह यूपी में केवल छोटे सहयोगी की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती।

यहीं से 150 सीटों की मांग को कांग्रेस के नजरिए से समझा जा सकता है। पार्टी सिर्फ उन लोकसभा सीटों को आधार नहीं मान रही होगी, जहां उसके उम्मीदवार जीते। वह उन विधानसभा क्षेत्रों को भी बातचीत की मेज पर देखना चाहेगी, जहां 2024 में कांग्रेस-सपा गठबंधन का प्रदर्शन मजबूत रहा और जहां कांग्रेस का संगठन या उसका सामाजिक आधार मौजूद है।

सपा की परेशानी यहीं से शुरू होती है

सपा के लिए समस्या यह है कि लोकसभा की एक सीट में कई विधानसभा क्षेत्र आते हैं। 2024 में कांग्रेस ने जिन लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की, उनमें शामिल विधानसभा सीटों पर स्थानीय स्तर पर सपा की भी राजनीतिक मौजूदगी हो सकती है।

इसलिए यदि कांग्रेस यह तर्क रखती है कि “2024 में हमने इन क्षेत्रों में गठबंधन के साथ अच्छा प्रदर्शन किया, इसलिए 2027 में इन विधानसभा सीटों पर हमारा दावा होना चाहिए”, तो सपा के सामने अपने संगठन और मौजूदा राजनीतिक आधार को देखते हुए सीट छोड़ने का सवाल खड़ा होगा।

दूसरी तरफ, मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि सपा कांग्रेस को अपेक्षाकृत कम संख्या में सीटें देने की इच्छुक बताई जा रही है और कांग्रेस से संभावित उम्मीदवारों तथा जमीनी रिपोर्ट मांगी जा रही है। यानी विवाद सिर्फ “150 बनाम कम सीटें” का नहीं है। असली सवाल यह है कि कौन सी सीटें किसके हिस्से में आएंगी।

रायबरेली से PDA रथ और सीट शेयरिंग का संदेश

इसी पृष्ठभूमि में अखिलेश यादव का रायबरेली से PDA रथयात्रा शुरू करना भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना। रायबरेली कांग्रेस के मजबूत क्षेत्रों में माना जाता है और लोकसभा में राहुल गांधी का निर्वाचन क्षेत्र है। ऐसे समय में वहां से सपा के अभियान की शुरुआत ने सीट शेयरिंग को लेकर अटकलों को और हवा दी।

हालांकि अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि सपा-कांग्रेस गठबंधन मजबूत है और गठबंधन के लिए काम किया जाएगा। इसलिए रायबरेली से यात्रा को सीधे सीटों पर दबाव बनाने की रणनीति कहना अभी एक राजनीतिक व्याख्या ही होगी। लेकिन संदेश के स्तर पर यह जरूर दिखता है कि सपा 2027 की अपनी तैयारी गठबंधन की बातचीत के समानांतर आगे बढ़ा रही है।

150 सीटों की मांग असल में कितनी सीटों की लड़ाई है?

यही इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। कांग्रेस 150 सीटों की बात कर रही है, लेकिन संभव है कि बातचीत का अंतिम केंद्र 150 का आंकड़ा नहीं, बल्कि उन 150 सीटों की सूची बने। कांग्रेस किन सीटों पर दावा करेगी? सपा किन सीटों को छोड़ने के लिए तैयार होगी? 2024 के लोकसभा प्रदर्शन को कितना वजन मिलेगा? 2022 के विधानसभा परिणाम कितने महत्वपूर्ण होंगे? और सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि जिस सीट पर दोनों दल अपना संगठन मजबूत मानते हैं, वहां फैसला किस आधार पर होगा?

यही कारण है कि आने वाले दिनों में सपा-कांग्रेस की असली राजनीतिक लड़ाई आंकड़ों से ज्यादा सीटों की सूची पर दिखाई दे सकती है। कांग्रेस के पास 2024 का प्रदर्शन अपने पक्ष में रखने का आधार है, जबकि सपा के पास यूपी में बड़ा विधानसभा संगठन और 2022 में 111 सीटें जीतने का अपना रिकॉर्ड है। ऐसे में दोनों दलों के पास बातचीत की मेज पर अलग-अलग तर्क होंगे।

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